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अमरिकी संसद में उघुर बिल पारित; तिब्बत की आज़ादी का विधेयक भी हुआ पेश

वॉशिंग्टन – उघुरवंशी इस्लामधर्मियों पर चीन कर रहें बेरहम अत्याचारों की अमरिकी संसद ने गंभीरता से दखल ली है। बुधवार के दिन अमरिकी संसद के प्रतिनिधि गृह में, उघुरों पर हो रहें अत्याचारों के लिए ज़िम्मेदार होनेवालें चीन के अफ़सरों पर प्रतिबंध लगानेवाला विधेयक पारित किया गया। साथ ही, चीन ने ज़बरन कब्ज़ा किए तिब्बत की आज़ादी का विधेयक भी अमरिकी संसद में पेश किया गया हैं। इस वज़ह से, चीन के लिए काफ़ी संवेदनशील समझे जा रहें मुद्दों पर प्रहार करने की तैयारी अमरीका ने की हुई दिख रही है।

बुधवार के दिन अमरिकी संसद के प्रतिनिधि गृह में ‘उघुर ह्युमन राईटस्‌ एक्ट’ ४१३ बनाम १ मत से पारित किया गया। संसद के वरिष्ठ सभागृह होनेवाले सिनेट में यह विधेयक पहले ही पारित हुआ है। इस वज़ह से, बुधवार को प्राप्त हुई मंज़ुरी के बाद यह विधेयक अब हस्ताक्षर करने के लिए राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रम्प के पास भेजा गया है। उघुरवंशियों से संबंधित इस कानून में, चीन के अफ़सरों पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। चीन के जो भी अफ़सर उघुरों पर कार्रवाई करने में शामिल होंगे, उन सभी को लक्ष्य किया जाएगा। इन अफ़सरों की अमरीका में स्थित संपत्ति ज़ब्त की ज़ायेगी और उन्हें अमरीका में प्रवेश भी नहीं मिलेगा।

इस कानून में चीन की शासक कम्युनिस्ट पार्टी के झिंजिआंग प्रांत के प्रमुख शेन क्वांगुओ का ज़िक्र है। शेन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के ताकतवर ‘पोलिटब्युरो’ के सदस्य हैं। झिंजिआंग में उघुरों पर की गई कार्रवाई का नियंत्रण शेन के हाथ में था। उन्होंने मानव अधिकार का उल्लंघन किया है, यह आरोप भी रखा गया है।

यह विधेयक पारित करते समय अमरिकी संसद के नेताओं ने चीन की कड़ी आलोचना की। झिंजिआंग प्रांत में उघुरों पर किए गए अत्याचार यानी चीन की शासक हुकूमत ने किया हुआ सांस्कृतिक वंशसंहार हैं, यह आरोप रिपब्लिकन नेता मायकल मॅक्वोल ने रखा है। अमरीका शांत रहकर ये अत्याचार इसके आगे बर्दाश्‍त नहीं कर सकेगीं, इन शब्दों में उन्होंने इस विधेयक का समर्थन किया।

चीन की शासक कम्युनिस्ट हुकूमत ने लगभग ११ लाख उघुर मुस्लिमों को, अत्याचार होनेवाले शिविरों में बंद कर रखा होने की चौकानेवाली बात एक रिपोर्ट से उज़ागर हुई थी। इसके बाद अमरीका के साथ आंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने, उघुरों के मुद्दे पर चीन को लगातार लक्ष्य करना शुरू किया है। अमरिकी संसद में पारित हुआ कानून भी इस मामले में उठाया गया काफ़ी बड़ा कदम है और उघुर गुटों ने इस प्रावधान का स्वागत किया है। उघुर वंशियों के साथ ही, तिब्बत के मुद्दे पर भी चीन को झटका देनेवाली गतिविधियाँ शुरू हुई हैं। चीन की कम्युनिस्ट हुकूमत ने वर्ष १९५९ में सेना घुसाकर तिब्बत पर ज़बरन कब्ज़ा किया था। इसके बाद तिब्बत को चीन के स्वायत्त प्रांत के तौर पर जाना जा रहा है। चीन ने किए इस कब्ज़े को आंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने मंज़ुरी भी दी थी। लेकिन, यह स्वायत्तता मात्र नाम के लिए है और असल में चीन ने तिब्बत की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान मिटाने की कोशिश की है।

अमरीका ने हालाँकि तिब्बत चीन का हिस्सा होने की बात मंजूर की है, लेकिन वहाँ के मानव अधिकारों का मुद्दा भी लगातार उठाया है। इतना ही नहीं, बल्कि ‘तिब्बत के नेता’ के रूप में पहचाने जानेवाले दलाई लामा को भी अमरीका ने खुले आम समर्थन दिया हैं। लेकिन तिब्बत को ठेंठ ‘आज़ाद देश’ घोषित करने से संबंधित विधेयक पहली ही बार अमरिकी संसद में पेश हो रहा है। रिपब्लिकन पार्टी की स्कॉट पेरी ने यह विधेयक पेश करने किया होने की बात सामने आयी है।

अबतक चीन ने, अपने अंदरूनी मामले में दूसरें किसी भी देश की दखलअंदाज़ी बर्दाश्‍त नहीं करेंगे, ऐसी कड़ी भूमिका ही अपनाई थी। इस वज़ह से, चीन में लगातार मानव अधिकारों को कुचले जाने का मुद्दा उपस्थित कर रहें देशों को चीन हमेशा धमकाता आया हैं। तिब्बत, तैवान, हाँगकाँग ये सभी मुद्दे चीन के लिए काफ़ी संवेदनशील होने की चेतावनी चीन ने पूरे आंतर्राष्ट्रीय समुदाय को बार बार दी थी।

लेकिन, अब उघुरवंशी इस्लामधर्मियों पर चीन द्वारा हो रहें अत्याचार, हाँगकाँग की स्वायत्तता, तिब्बत की आज़ादी एवं तैवान की सार्वभूमता ऐसें सभी मुद्दों पर अमरीका ने चीन को घेर रखा है और अमरीका के इस राज़नीतिक तूफ़ान के सामने चीन फ़िलहाल हैरान हुआ दिख रहा है।

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