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यूरोप में स्थित अपना लशकर मुख्यालय अमरीका बेल्जियम में स्थानांतरित करेगा – 6,400 सैनिकों को वापिस बुलाने का भी किया ऐलान

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वॉशिंग्टन/बर्लिन – इंधन के लिए जर्मनी प्रतिवर्ष रशिया को अरबों डॉलर्स प्रदान करता है और ऐसे में अमरीका ही जर्मनी को रशिया से सुरक्षित रखे, यह उम्मीद रखता है। यह बात समझ से परे है। नाटो नियमों के अनुसार जर्मनी रक्षा पर 2% खर्च करने से भी इन्कार कर रही है। इस वजह से अमरीका ने जर्मनी  स्थित अपने कुछ सैनिकों को वापिस बुलाने का निर्णय लिया है, इन शब्दों में अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रम्प ने जर्मनी से सेना वापिस बुलाने के संबंधित निर्णय की जानकारी दी। यूरोप में हुई मौजुदा लष्करी तैनाती में बदलाव लाना अमरीका के लिए एक बड़ा रणनीतिक और सकारात्मक बदलाव है, इन शब्दों में रक्षामंत्री मार्क एस्पर ने इस निर्णय की जानकारी साझा की। अमरीका अब यूरोप में स्थित अपना लशकर मुख्यालय एवं ‘स्पेशल ऑपरेशन कमांड’ केंद्र जर्मनी से बेल्जियम में स्थानांतरित करेगी, यह जानकारी वरिष्ठ सेना अधिकारी जनरल टॉड वॉल्टर्स ने प्रदान की।

अमरीका के राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले महीने ही जर्मनी में तैनात सेना की वापसी की योजना को मंजूरी दी थी। अमरीका अपने मित्रदेशों की सुरक्षा के लिए ‘जीडीपी’ के 4% से अधिक खर्च कर रहा है और इसके मुकबले में जर्मनी जैसा देश जीडीपी के लगभग 1.2% राशि रक्षा हेतु खर्च करता है, यह जानकारी देते हुए ट्रम्प ने जर्मनी पर नाराज़गी व्यक्त की थी। जर्मनी के साथ जारी द्विपक्षीय व्यापार में अमरीका को हो रहा नुकसान और रशिया के सहयोग से जर्मनी का इंधन पाईप लाइन के निर्माण के मुद्दों पर भी राष्ट्राध्यक्ष ट्रम्प की जर्मन नेतृत्व के साथ अनबन हो रही थी। इस पृष्ठभूमि पर अमरीका द्वाता लिया गया निर्णय ध्यान आकर्षित कर रहा है।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद से जर्मनी में अमरिकी सैनिकों की तैनाती की गई है। सोवियत रशिया से खतरे की पृष्ठभूमि पर जर्मनी की रक्षा करने के लिए अमरीका ने यह तैनाती की थी और आनेवाले दौर में सीर्फ़ जर्मनी ही नहीं बल्कि यूरोप के अन्य देशों की रक्षा के लिए भी अमरीका द्वारा की गई लशकर की तैनाती अहम मानी जाती थी। लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प अमरीका के राष्ट्राध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने नाटो के सभी सदस्य देशों को रक्षा खर्च में अधिक भार उठाने का आवाहन किया था। नाटो के सदस्य देशों की रक्षा के लिए अमरीका ने बहुत बड़ी मात्रा में खर्च किया है। लेकिन अब सदस्य देशों को भी रक्षा के लिए अधिक खर्च करना होगा, यह इशारा ट्रम्प ने दिया था।

जर्मनी में तैनात अपनी सेना अमरिका हटा रही है, मगर इससे यूरोप की सुरक्षा पर खास फर्क नहीं पडेगा, यह बात रक्षामंत्री एस्पर एवं वरिष्ठ सेना अधिकारियों ने कही, यह जानकारी से स्पष्ट हुआ है। अमरिकी रक्षामंत्री ने कहा कि, ‘यूरोप में लशकर तैनाती के मुद्दे पर रक्षा विभाग ने पांच उद्देश्‍य तय किए गए हैं और इसके अनुसार बदलाव किए गए हैं।’ इसमें रशिया के विरोध में आवश्‍यक क्षमता बरकरार रखना, नाटो की मज़बुती, मित्रदेशों को आश्‍वस्त करना, लशकर मुहीम एवं सामरिक स्तर पर लचिलापन बढ़ाना एवं अमरिकी सैनिकों समेत उनके परिजनों का ध्यान रखने के मुद्दों का समावेश है। यूरोप में मौजूदा लष्करी तैनाती की रचना में किया गया बदलाव अमरीका की ‘नैशनल डिफेन्स स्टैटेजी’ के तहत ही होने का दावा भी रक्षामंत्री एस्पर ने किया।

यूरोप में अमरिकी सेना का मुख्यालय बने जर्मनी में अमरीका के तकरीबन 47 हज़ार सैनिक एवं कर्मि तैनात हैं। इनमें से 36 हज़ार सैनिक ‘रैमस्टन एअर बेस’ समेत जर्मनी के विभिन्न अड्डों पर तैनात हैं। इन 36 हज़ार सैनिकों में से 1100 सैनिकों को जर्मनी से स्थानांतरित किया जाएगा। इनमें से 5600 सैनिक इटली, बेल्जियम, पोलैण्ड एवं अन्य बाल्टिक देशों में तैनात किए जाएंगे। साथ ही जर्मनी के स्टुटगार्ट शहर में मौजूद ‘यूएस यूरोपियन कमांड’ और ‘स्पेशल ऑपरेशन कमांड यूरोप’ का मुख्यालय सभी बेल्जियम में स्थानांतरित किए जाएंगे। अमरिका में लौटने को कहे गए 6400 सैनिकों में से कुछ सैनिकों को बाद में ‘ब्लैक सी’ क्षेत्र में तैनात करने के संकेत अमरिकी सेना अधिकारियों ने दिए हैं। बीते वर्ष पोलैण्ड ने अमरीका के सामने रक्षाअड्डा स्थापित करने के लिए प्रस्ताव रखा था, इस ओर भी कुछ विश्‍लेषक ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।

अमरीका ने सेना की वापसी करने के संबंध में की घोषणा के बाद भी अमरीका के करीबन 24 हज़ार सैनिक जर्मनी स्थित लष्करी अड्डों पर तैनात रहेंगे। अमरीका के इस निर्णय पर जर्मनी ने नाराज़गी व्यक्त की है और कुछ जर्मन नेता एवं विश्‍लेषकों ने सुरक्षा के मुद्दे पर अमरीका के साथ चर्चा जारी रखने का अनुरोध कर रहे हैं।

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