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तैवान के मुद्दे पर जर्मनी ने चीन को लगाई फटकार

बर्लिन/बीजिंग – सभी यूरोपिय देश एक दूसरे के सहयोग से काम करते हैं। यूरोप से सहयोग की उम्मदी रखनेवाले देशों को यूरोपिय देशों का उचित सम्मान भी करना चाहिए। किसी भी मुद्दे पर यूरोपिय देशों को धमकाना बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा। अमेरीका से बैर करने का स्थान यूरोप नहीं है, इसका अहसास रहे’ ऐसे तेज़तर्रार शब्दों में जर्मनी के विदेश मंत्री हैको मास ने चीन की धमकी का मुंहतोड जवाब दिया। जर्मनी के विदेश मंत्री का यह बयान चीन को कड़े वास्तव का एहसास करानेवाला साबित होता है।

बीते सप्ताह में यूरोपिय महासंघ के सदस्य ‘ज़ेक रिपब्लिक’ के उच्च स्तरीय शिष्टमंडल ने तैवान का दौरा किया। ज़ेक रिपब्लिक के संसद प्रमुख मिलॉस विस्त्रसिल के नेतृत्व में हुए इस दौरे से चीन की कम्युनिस्ट हुकूमत को बडी मिर्ची लगी है। ज़ेक शिष्टमंडल के तैवान दौरे के दौरान ही चीन के विदेशमंत्री वैंग यी यूरोपिय देशों की यात्रा कर रहे थे। ज़ेक नेताओं ने रेड़ लाईन का उल्लंघन किया है और उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पडेगी, इन शब्दों में चीन के विदेशमंत्री ने धमकाया था। बर्लिन में जर्मन विदेशमंत्री के साथ हुई वार्तापरिषद के दौरान भी विदेशंमत्री वैंग यी ने ज़ेक नेताओं पर राजनीतिक अवसर का लाभ उठाने की कोशिश और विचारशून्य कृति करने का आरोप लगाया।

आर्थिक और व्यापारी ताकत के बल पर यूरोप पर दबाव डालने की कोशिश इस बार सफल होगी, यह अंदाजा चीन लगा रहा था। अमरीका के साथ संबंधों में तनाव निर्माण हो रहा था तभी चीन जैसे आर्थिक महासत्ता को खफा ना करने की नीति यूरोप के प्रमुख देशों ने और महासंघ ने पहले अपनाई थी। इसी का गलत लाभ उठाकर चीन ने यूरोप में अपना प्रभाव बढ़ाने के साथ ही संवेदनशील मुद्दों पर यूरोपिय देशों में दरार डालने की नीति भी अपनाई थी। बीते कुछ वर्षों में जर्मनी, इटली, स्पेन जैसे प्रमुख देशों के साथ पूर्वी यूरोप के देशों से चीन को लेकर हो रहे निर्णय चीन की इसी नीति को प्राप्त हो रही कामयाबी के संकेत थे। लेकिन, इस वर्ष के शुरू में फैली कोरोना वायरस की महामारी और इसके बाद चीन की हुकूमत ने हाँगकाँग, साउथ चायना सी और उइगरवंशियों जैसे मुद्दों पर किए निर्णयों की पृष्ठभूमि पर यूरोप में चीन के खिलाफ़ असंतोष की भावना और भी तीव्र होती जा रही है।

बीते कुछ महीनों में महासंघ के साथ यूरोप के कई नेताओं ने चीन को लगातार इस बात का एहसास दिलाया था। महासंघ के अध्यक्ष उर्सुला व्हॉन डेर लेयेन ने यूरोपियन संसद को संबोधित करने के लिए किए भाषण में चीन के साथ बने संबंधों को लेकर नाराज़गी व्यक्त करनेवाला बयान किया था। तभी, हाँगकाँग में सुरक्षा कानून थोंपने के बाद जर्मनी के विदेशमंत्री ने यूरोप को चीन के साथ जारी संबंधों पर पुनर्विचार करना पड़ेगा, इन शब्दों में चेतावनी दी थी। फ्रान्स ने ‘५-जी’ तकनीक के लिए चीन की हुवेई कंपनी की सहायता प्राप्त करनेवाली स्थानीय कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया था। यूरोपिय महासंघ एवं संसद में चीन के विरोध में कुछ प्रस्ताव भी पारित किए गए थे। लेकिन, अपनी दबाव नीति पर भरोसा करनेवाली चीन की हुकूमत ने इस ओर अनदेखा किया था। यह अनदेखा करना अब मुश्‍किलों का कारण बनने के संकेत प्राप्त हुए हैं और जर्मन विदेशमंत्री ने चीनी विदेशमंत्री के मौजूदगी में इसी वार्तापरिषद में चीन को कड़े बोल सुनाना भी उसी के स्पष्ट संकेत हैं। जर्मन विदेशमंत्री के बयान पर प्रमुख यूरोपियन देशों ने व्यक्त किया समर्थन ध्यान आकर्षित करनेवाला साबित होता है और चीन की मुश्‍किलें इसके आगे और भी बढ़ेंगी, इसके आसार भी दिखाई देने लगे हैं।

इसी बीच कुछ दिन पहले जर्मनी ने स्वतंत्र इंडो-पैसिफिक नीति घोषित करने की जानकारी सामने आयी है। इस नीति के तहत सामर्थ्य के बल पर जैसे थे स्थिति में बदलाव करने की गतिविधियां और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करने पर आलोचना की गई थी। चीन के एशियाई देशों के साथ संबंधों में तनाव पर भाष्य ना करनेवाले जर्मनी ने सीधे स्वतंत्र नीति का ऐलान करना यानी चीन को दिया गया इशारा होने का दावा विश्‍लेषक कर रहे हैं। चीन की आक्रामक वर्चस्ववादी हरकतों की वजह से फिलहाल इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बड़ा तनाव बना हुआ है। इसी पृष्ठभूमि पर इस क्षेत्र को लेकर स्वतंत्र नीति का ऐलान करनेवाला जर्मनी अब फ्रान्स के बाद यूरोप का दूसरा देश है।

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