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चीन समर्थक राष्ट्रपति अब्दुल्ला को परास्त करके मालदीव के चुनावों में जनतंत्रवादी शक्तियों की विजय

माले – मालदीव के चीन समर्थक राष्ट्राध्यक्ष अब्दुल्ला यामीन चुनाव हार गए हैं। विरोधी पक्ष नेता इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को इस चुनाव में मिली सफलता जनतंत्रवादी शक्तियों की विजय मानी जाती है, ऐसा कहकर भारत ने इस नतीजे का स्वागत किया। अमेरिका ने भी इस चुनाव के नतीजे का स्वागत किया और सोलिह को बधाइयां दीं। इस नतीजे की वजह से हिंद महासागर क्षेत्र में चीन को एक और झटका लगा है।

मालदीव के चुनाव आयोग ने घोषित किया कि, सोलिह के पक्ष को सर्वाधिक वोट मिले हैं। उनकी विजय का निर्णय घोषित हुआ पर राष्ट्राध्यक्ष अब्दुल्ला यामीन, जिनके हाथ में अब भी मालदीव की सत्ता है, अब क्या करेंगे इस पर सभी का ध्यान केंद्रित था। तानाशाही की प्रवृत्तिवाले इस नेता को चीन का समर्थन है। इसके बल पर यामीन ने मालदीव की सत्ता हथियायी थी। कुछ महीनों पहले राष्ट्राध्यक्ष यामीन ने उनके विरोध में निर्णय घोषित करनेवाले न्यायाधीशों को भी अपने कब्जे में रखा था। पर इस चुनाव के नतीजे के बाद यामीन ने अपनी हार मान ली है, ऐसी खबरें छपी हैं।

राष्ट्राध्यक्ष यामीन ने मालदीव में ढांचागत सुविधाओं की विकास परियोजनाओं के लिए चीन से बहुत बडा कर्ज लिया था। इस कर्ज का फंदा बहुत जल्द मालदीव के गले में होगा और मालदीव के बंदरगाह एवं महत्वपूर्ण स्थान चीन के कब्जे में होंगे, ऐसे चिन्ह दिखाई दे रहे थे। हिंद महासागर क्षेत्र में मालदीव जैसे महत्वपूर्ण देश पर चीन का ऐसा प्रभाव प्रस्थापित होना भारत के लिए खतरनाक साबित हो सकता था। मालदीव और भारत के बीच परंपरागत मैत्रीपूर्ण संबंधों को नजरंदाज करके राष्ट्राध्यक्ष यामीन ने चीन समर्थक धारणा अपनाई थी। इसलिए मालदीव के नेताओं की मांग थी कि, भारत सैनिकी हस्तक्षेप करके इस देश की जनता को यामीन की तानाशाही हुकूमत से निजात दिलाए।

पर चीन ने धमकाया था कि भारत अगर मालदीव में सैनिकी हस्तक्षेप करेगा तो उसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे। मगर भारत ने मालदीव में सैनिकी हस्तक्षेप की संभवता से इनकार कर दिया था। इस पृष्ठभूमि पर सोलिह की विजय मालदीव को फिरसे जनतंत्र की दिशा में ले जाएगी इस बात से भारत को बहुत बड़ा दिलासा मिला है।

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