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तिब्बत का चीनीकरण करने की जिनपिंग की कोशिश चिंताजनक – अमरिकी विदेशमंत्री माईक पोम्पिओ

वॉशिंग्टन/बीजिंग – चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव शी जिनपिंग ने तिब्बत के बौद्ध का चीनीकरण करने के मुद्दे पर किया गया बयान और उस क्षेत्र में जारी गतिविधियां तीव्र चिंताजनक होने की आलोचना अमरिकी विदेशमंत्री माईक पोम्पिओ ने की है। तिब्बती नेता डॉ.लॉबसांग सांगेय ने भी जिनपिंग के बयान पर नाराज़गी व्यक्त की है और चीन ने तिब्बत की संस्कृति का संहार करने की साज़िश रचने का आरोप किया है। बीते सप्ताह में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की तिब्बत के मुद्दे पर विशेष बैठक हुई थी। इस बैठक में राष्ट्राध्यक्ष शी जिनपिंग ने तिब्बत का बौद्ध धर्म चीन के समाजवादी व्यवस्था के तहत विकसित करना होगा, ऐसी विचित्र माँग की थी।

कोरोना की महामारी की पृष्ठभूमि पर अपनी विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ा रही चीन की कम्युनिस्ट हुकूमत ने अंतरराष्ट्रीय समझौता ठुकराकर ज़बरन ही हाँगकाँग पर कब्ज़ा किया है। उसी समय तैवान के साथ साउथ चायना सी क्षेत्र के हिस्सा निवाला बनाने की कोशिश शुरू की है। चीन की इन गतिविधियों की वजह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में तीव्र नाराज़गी की भावना है और कई देशों ने सामने आकर खुलेआम विरोध करना शुरू किया है। तिब्बत के साथ उइगरवंशियों के खिलाफ़ चीन ने अपनाई हुई नीति तीव्र चिंता का विषय होने का एहसास अमरीका के साथ यूरोपिय देश एवं जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे प्रमुख देशों ने दिलाया है। अमरिकी संसद में स्वतंत्र तिब्बत के मुद्दे पर विधेयक भी पेश किया गया है।

इस पृष्ठभूमि पर चीन के राष्ट्राध्यक्ष जिनपिंग ने तिब्बत में चीनीकरण करने की नई मुहीम शुरू करने को लेकर दिए संकेत ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। बीते सप्ताह में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने बीजिंग में ‘सेवन्थ सेंट्रल सिम्पोसिअम ऑन तिब्बत’ नाम की बैठक का आयोजन किया था। इस दौरान जिनपिंग ने तिब्बत की स्थिरता के लिए चीन ने एक अभेद किला बनाने की आवश्‍यकता होने का दावा किया। चीन की सुरक्षा मज़बूत करने के लिए तिब्बत में अलगाववादी गतिविधियां रोकना आवश्‍यक है और इसके लिए इस क्षेत्र की जनता को शिक्षित करने की आवश्‍यकता है। नया आधुनिक समाजवादी तिब्बत बनाने की ज़रूरत है और इसके लिए शैक्षणिक सुधार करने होंगे। तिब्बत के बौद्ध धर्म ने समाजवादी व्यवस्था से मेल करना होगा और तिब्बती बौद्ध धर्म का चीनीकरण करने के लिए प्रोत्साहन देना होगा, यह आवाहन शी जिनपिंग ने किया।

चीन की कम्युनिस्ट हुकूमत ने इससे पहले तिब्बत के क्षेत्र पर कब्ज़ा करके वहां की जनता के बुनियादी, सियासी एवं धार्मिक अधिकार भी ठुकराए हैं। साथ ही तिब्बत की विशेषताओं से भरी धार्मिक संस्कृति का संहार करने की नीति पर चीन की हुकूमत अमल कर रही है। तिब्बतियों की आज़ादी की ज़रूरत ही नहीं है बल्कि स्वयत्तता की माँग भी चीन ने ठुकराई है। अपनी आर्थिक, सियासी और लष्करी ताकत के बल पर चीन ने आज तक तिब्बत की जनता की आवाज़ दबाई है, फिर भी बीते कुछ महीनों से स्थिति बदलती दिख रही है। इससे चीन की हुकूमत ने फिरसे तिब्बत पर कब्ज़ा करने के लिए आक्रामक कदम उठाना शुरू किए हैं, यही बात जिनपिंग के बयान से दिख रही है। इस बयान पर अमरीका और तिब्बती गुटों ने गुस्से से भरी प्रतिक्रियाएं दर्ज़ की हैं।

तिब्बती बौद्ध धर्म का चीनीकरण करने के लिए जिनपिंग की जारी कोशिशें और अलगाववादी गतिविधियों के खिलाफ़ संघर्ष करने को लेकर जिनपिंग ने किए बयान अमरीका के लिए तीव्र चिंता का विषय हैं। चीन ने तिब्बत में जारी गतिविधियों की और भी अमरीका का ध्यान आकर्षित हुआ है। तिब्बती नेता दलाई लामा के साथ बिना शर्त चर्चा शुरू करके चीन अपने मतभेद ख़त्म करे, यह माँग अमरीका कर रही है। इन शब्दों में अमरिकी विदेशमंत्री ने चीन को फटकार लगाई है। भारत में ‘तिब्बती गवर्नमेंट इन एक्ज़ाईल’ के प्रमुख डॉ.लॉबसांग सांगेय ने भी जिनपिंग की योजना पर कड़ी आलोचना की है।

तिब्बती जनता के लिए चीन के कम्युनिज़म से अधिक बौद्ध धर्म अहम है। तिब्बती जनता पर धर्म से भी ज्यादा कम्युनिज़म को अहमियत देने के लिए जबरदस्ती करना धार्मिक आज़ादी का उल्लंघन साबित होता है। यह तिब्बत की संस्कृति और धार्मिक पहचान ख़त्म करने की कोशिश है। लेकिन, तिब्बती बौद्ध धर्म का चीनीकरण कभी भी कामयाब नहीं होगा, ऐसी आलोचना डॉ.लॉबसांग सांगेय ने की है। ह्युमन राईट्स वॉच, स्टुडंट्स फॉर फ्री तिब्बत और इंटरनैशनल कैम्पेन फॉर तिब्बत जैस गुटों ने भी जिनपिंग की योजना पर असंतोष व्यक्त किया है।

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